आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Urdu Poetry: हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला

उर्दू अदब
                
                                                         
                            कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला
                                                                 
                            
हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला

फ़िक्र हर बार ख़मोशी से मिली है मुझ को
और ज़माना ये मुझे शोर मचाने से मिला

उस की तक़दीर अंधेरों ने लिखी थी शायद
वो उजाला जो चराग़ों को बुझाने से मिला

पूछते क्या हो मिला कैसे ये जंगल को तिलिस्म
छाँव में धूप की रंगत को मिलाने से मिला

और लोगों से मुलाक़ात कहाँ मुमकिन थी
वो तो ख़ुद से भी मिला है तो बहाने से मिला

मेरी तश्कील तो कुछ और हुई थी 'दानिश'
ये नया नक़्श मुझे ख़ुद को मिटाने से मिला

~ मदन मोहन दानिश

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

20 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर