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सुधरी नहीं

                
                                                         
                            मैं किसी के वास्ते कुछ भी नहीं
                                                                 
                            
इसलिए मेरी कहीं बनती नहीं।

मैं अँधेरों में सिमट के रह गया
तीरगी मेरी कभी घटती नहीं।

उम्र खटने में गई पूरी ग़ुजर
घर की हालत फिर भी है सुधरी नहीं।

अब तो सचमुच में लगी होने थकन
पर किसी को ये थकन दिखती नहीं।

सब्र मुझको और दो भगवन मिरे
इसके बिन तो ज़िंदगी चलती नहीं।
-पंडित अनिल
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एक घंटा पहले

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