समंदर की लगी चोटों से पत्थर टूट जाता है
बड़ा ज़िगरा हो जिसका वो भी अक्सर टूट जाता है।
कभी टूटा नहीं जो घर की हर मुश्किल उठाने में
वो घर में अपनी पा जाए अनादर टूट जाता है।
उसे आखिर में मिलती है वही झिड़की वही बंदिश
जो पूँजी साँस की अपनी लुटाकर टूट जाता है।
कभी हारा नहीं जो ज़िंदगी की तेज आँधी में
वो मिलती बेरुख़ी से यार डर कर टूट जाता है।
न जाने क्यों सितम इतने अनिल है ज़िंदगी करती
कि सीधी राह जो चलता है क्यों कर टूट जाता है।
-पंडित अनिल
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