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मजदूर की जिंदगी

                
                                                         
                            जमीन पर
                                                                 
                            
बैठ कर
खाना खा रहा हूं
नल का पानी पी रहा हूं
तब तक मालिक आया
जोर से डांट लगाया
"जल्दी खाओ
काम पर लग जाओ"
खाना खाने का भी वक्त नहीं है
पानी पीने का भी वक्त नहीं है
जिंदगी कैसी है, क्या बताऊं?
दो रोटी भी खा न पांऊ
मालिक का घर बनाता हूं
खुद कहीं सो जाता हूं
खून पसीना बहाता हूं
तो भी डांट खा जाता हूं
दर्द अपना किस किस को बताऊं?
कभी भूखा सो जाऊं
कभी दो रोटी खाऊं
कहीं भी सो जाऊं
मच्छरों से खुद को कटवाऊं
सुबह उठते ही काम पर जाऊं
रात के अंधेरे में घर आऊं
जीवन ऐसे ही बिताऊं।
- सहज कुमार
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एक घंटा पहले

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