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स्वतंत्र मन: एक वैराग्य

                
                                                         
                            न बाँध सकीं ये रेशमी डोरियाँ मुझको,
                                                                 
                            
न स्वर्ण-मृग का कोई प्रलोभन शेष रहा,
अंबर सा असीमित हूँ, दिशाएँ मेरी हैं,
मेरे भीतर अब मोह का न कोई लेश रहा।
मुझ पर मोह शासन नहीं कर सकता,
मैंने तृष्णा के हर पर्वत को लांघा है,
संसार जिसे बटोरने में उम्र गँवा देता है,
मैंने उस वैभव से बस किनारा माँगा है।
तुम कहते हो कठिन है रिश्तों की बेड़ियाँ,
तुम कहते हो भारी है यादों का बस्ता,
पर देख मेरी आँखों में वो तटस्थ शांति,
जहाँ हर बंधन खुद-ब-खुद है ढहता।
त्यागना बहुत आसान है मेरे लिए!!
जैसे पतझड़ में वृक्ष पत्तों को विदा करता है,
जैसे प्रभात का सूरज जुगनू का मोह तजकर,
एक नई अग्नि, एक नए आकाश में उतरता है।
मैं न बंधा कल से, न थमा हूँ आज पर,
मैं वह मुसाफिर हूँ जिसका कोई पड़ाव नहीं,
जो शून्य को पा ले, उसे खोने का भय क्या?
मेरे अडिग मन पर अब किसी का प्रभाव नहीं।
- ठाकुर अंकुश सिंह!!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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