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अब जब चल पड़े है तो डर कैसा

                
                                                         
                            अब जब चल पड़े हैं तो डर कैसा,
                                                                 
                            
खुद के गिरने, उठने पर सवाल कैसा।

राह में कहीं तो पहुँचेंगे,
अपने आपको कहीं तो रोकेंगे।

इस मन की जंजीरों को तोड़,
इच्छाओं के आकाश में उड़।

राहों को नापते हुए,
खुद के सपनों की ओर।

डगर इसलिए नहीं चुनी थी
कि कोई क्या कहता है,
तुमको दरिया से कितना डर लगता है।

खुद के अरमान,
खुद की इच्छाएँ थीं,
खुद के सपनों की एक और उड़ान थी।

उड़ान उस जीत की,
लक्ष्य पर पहुँचने की।

राह में थोड़ी थकान भी होगी,
मंज़िल कभी दूर, कभी पास भी होगी;
खुद से ही सवाल, खुद की ही पहचान होगी।

गिरने की एक और मिसाल होगी,
कितना थक गए, कितनी मुश्किलें आईं—
यह सब छोड़, तुम आगे बढ़ना,
अपने जुनून को तुम कायम रखना।

हार भी गए, तो फिर से कोशिश करना,
मंज़िल को अपनी नज़रों में रखना।

कल एक कहानी और होगी,
जिसकी मिसालें पीछे छूटने वाले देंगे;
तुम्हारे जैसा बनने की वो फिर कोशिश करेंगे।

एक बात हमेशा याद रखना—
अपनी मंज़िल पर पहुँचकर ही रुकना।

जीत कर फिर से एक नई कोशिश करना,
खुद के आगे एक और लक्ष्य रखना।

ऐसे ही तुम आगे बढ़ोगे,
ऐसे ही तुम्हारी कहानी बनेगी;
हार के बाद, जीत की फिर बात बनेगी!
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एक दिन पहले

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