एक दालमंडी थी!
एक ही सदी पहले
रंग में डूबी शब भर
दास्तानें उल्फ़त से
दर ब दर चहकती थी
बांध कर जवां घुंघरू
साज़ पर तरन्नुम में
जा ब जा थिरकती थी
एक दालमंडी थी!
शायरों का मरक़ज़ थी
आशिक़ों की मंज़िल थी
रिंद बामो दर बैठे
भूल दीनो मज़हब को
एक जाम पीते थे
मोमिनों का पर्दा थी
काफ़िरों की बस्ती थी
एक दालमंडी थी!
थे फ़िदा "असदुल्लाह"
"भारतेंदु" आशिक़ थे
थी "अदा" यहीं रहती
अपनी दास्तां कहती
ये "प्रसाद" की धरती
"प्रेमचंद" का किस्सा
कैसे बात करती थी
एक दालमंडी थी!
"जद्दन" और "रसूलन" की
गूंजती सदाएं थीं
"गौहर" और "अमीरन" की
दिलरुबा अदाएं थीं
सुर सजाए "बिस्मिल्लाह"
इस गली में फिरते थे
जब भी ये संवरती थी
एक दालमंडी थी!
बाग बावड़ी गुलशन
वो सिंगार औ बन ठन
कब के मिट गए सारे
ऊंचे ऊंचे वो कोठे
चमचमाती मीनारें
सब की सब बनीं गुपचुप
सब कभी चहकती थी
एक दालमंडी थी!
आज दालमंडी में
गूंजते हैं "बुलडोजर"
ढह रहे कई रिश्ते
मिट रहे कई मंज़र
वो भी इक ज़माना था
आज जो फ़साना है
वो भी एक बस्ती थी
एक दालमंडी थी
एक दालमंडी थी..!!
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