सब वह कहते हैं हम हो रहे हैं विकसित और आगे रहे हैं बढ़
पर मुझे लगता है विकसित के साथ-साथ
हम हो रहे हैं संकुचित, रहे हैं निरंतर सिकुड़
माना परिवर्तन है प्रकृति का नियम और है आवश्यक परिवर्तन
लेकिन क्या परिवर्तन की भी हो सकती है कोई सीमा
क्यों भूल गए हैं हम अपनी संस्कृति
और संस्कार हो रहे हैं कम
अब तो मानो सब कुछ हो रहा है कम
परिवार हो रहे हैं सीमित, बच्चे हो रहे हैं कम
घी-मक्खन, लस्सी पीना तो हो ही गया समाप्त
मान-मर्यादा कम हुई, नींद आती नहीं,बाल झड़ने लगे
कपड़े कम हुए, लज्जा शर्म हुई कम
घर में खाना कम हुआ, खुराक कम हुई
पुस्तकें पढ़ना कम हुआ, बाहरी खेल हुए बंद
चलना और व्यायाम हो गया है कम
अब तो मानो सब कुछ हो रहा है कम
तांबे पीतल के बर्तन हुए गायब,मेहमान हो गए कम
सुख चैन कम हुआ,सभ्यता कम हुई,सहनशीलता हुई कम
धार्मिक स्थलों पर जाना हुआ कम
समर्पण कम हुआ, मातृभाषा बोलना कम हुआ,
प्रेम कम हुआ, आदर सत्कार कम हुआ, पाँव छूने का चलन कम हुआ
साथ में मिलकर खाना, हंसना, बोलना और मेल मिलाप हो गया कम
घर की समस्याएँ मिलकर सुलझाने का चलन भी हो गया कम
अब तो मानो सब कुछ हो रहा है कम
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