नहीं चाहते हुए भी हम चलते
हैं उन्हीं राहों पर।
जिन राहों पर चलना हमें गंवारा
नहीं होता।।
यादों के उजाले में टुकड़ों में
अंधेरे हैं।
ये रात अकेली है यादों के
थपेड़ें है।।
कोई साथ में हो भी तो जज़्बात
नहीं होता।
बड़ी शोर है दूनियां में दिल
तन्हा अकेले हैं।।
किस ओर चले जाएं जाने
होगी कहां मंज़िल।
कब होंगी खतम रातें कहां मेरे
सवेरे है।।
एक राह निकलती थी इस दिल से
उस दिल तक।
बिखरे उन्हीं राहों पर दुश्वारियां
घनेरे है।।
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