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वासनाओं के अंधे दर्पण

                
                                                         
                            अल्प वस्त्रों में स्त्री को देखकर
                                                                 
                            
जिनकी नसों में ज्वाला भड़कती है,
हे उन्मत्त पुरुषो,
क्या तुम सचमुच मानव कहलाते हो?

या केवल देह की छाया हो
जिसमें चेतना का दीप नहीं जलता?

नयन तुम्हारे शिकारी हैं,
मन तुम्हारा अरण्य—
जहाँ करुणा की कोई पगडंडी नहीं।

संयम की नदी सूख चुकी,
विवेक का आकाश धुँधला है,
और वासना की आँधी
तुम्हें स्वयं से दूर उड़ा ले जाती है।

स्त्री तुम्हारे लिए
केवल एक दृश्य भर रह गई,
एक वस्तु—
जिसमें तुम अपनी भूख का प्रतिबिंब ढूँढते हो।

पर बताओ,
क्या यही तुम्हारी मनुष्यता है?

जहाँ सम्मान मर जाए,
और दृष्टि दूषित हो जाए,
वहाँ आत्मा किस कोने में शरण लेती है?

तुम्हारे भीतर
न करुणा की शीतल छाया,
न धैर्य का स्थिर पर्वत,
न संवेदना की कोमल ध्वनि।

फिर किस आधार पर
तुम दिव्यता का स्वप्न देखते हो?

मोक्ष की बातें
तुम्हारे अधरों पर शोभा नहीं देतीं,
जब मन ही
अंधकार का घर बन चुका हो।

हे वासना के दासों,
पहले स्वयं को जीतना सीखो,
क्योंकि असली युद्ध
बाहर नहीं—भीतर जलता है।

संयम ही वह दीप है
जो तुम्हें मनुष्य बनाता है,
और करुणा वह पथ
जो देवत्व तक ले जाता है।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

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