जलियांवाला बाग हत्याकांड की वह संध्या,
इतिहास आज भी जिसे थामे खड़ा है—
बैसाखी का उत्सव था,
पर रक्त से भीगा हर एक कण पड़ा है।
निर्दोष जन, निहत्थी भीड़,
अपनों संग आशा लिए आई थी,
पर क्रूर आदेशों की आँधी ने
मानवता की लौ बुझाई थी।
जनरल डायर के निर्मम संकेत पर,
गोलियों की वर्षा होने लगी,
धरती माँ की गोद में
मासूमों की चीत्कार खोने लगी।
कोई किसान, कोई मजदूर,
कोई बालक, कोई माँ—
सबके सपनों का अंत हुआ,
जब बरसा अन्याय का विषम तीर वहाँ।
“शहीदी कुआँ” भी मौन खड़ा है,
आज भी कथा सुनाता है,
जहाँ प्राण बचाने को कूदे लोग,
पर मृत्यु ही उन्हें अपनाता है।
उस रक्त-रंजित धरती ने
क्रांति की ज्वाला जगा दी,
हर हृदय में स्वाधीनता की
अटल लौ सदा जला दी।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी क्षोभ में
अपनी उपाधि लौटाई थी,
और महात्मा गांधी ने तब
आंदोलन की राह दिखाई थी।
वर्षों बाद उधम सिंह ने
न्याय का दीप जलाया,
अन्याय के उस प्रतीक को
विदेशी भूमि पर ही गिराया।
आज भी वहाँ का हर पत्थर
शौर्य की गाथा गाता है,
अज्ञात शहीदों का बलिदान
भारत को सिर ऊँचा कराता है।
वह रक्त नहीं, वह बीज था—
जिससे आज़ादी का वृक्ष उगा,
उनकी कुर्बानी के आगे
हर युग श्रद्धा से झुका।
- दीपक मिश्र “कांधी वाला
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