आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Hasya: मसरूर शाहजहाँपुरी की ग़ज़ल- ए'तिबार उठ गया हमदर्द दवा-ख़ाने से

हास्य
                
                                                         
                            दर्द कुछ कम न हुआ अपना दवा खाने से 
                                                                 
                            
ए'तिबार उठ गया हमदर्द दवा-ख़ाने से 

वो कचहरी से बुलाते हैं कभी थाने से 
हम भी वो ढीट हैं हड़के नहीं हड़काने से 

इस बुढ़ापे में लगाया है उन्हों ने सुर्मा 
बाज़ आते नहीं वो अब भी सितम ढाने से 

उन के अब्बा को रक़ीबों ने बहुत भड़काया 
वो तो अच्छा हुआ भड़के नहीं भड़काने से 

न उठा पाए वो मटका तो उन्हों ने हम को 
कभी आँखों से पिलाई कभी पैमाने से 

वो न जागे कि ज़रा जागती तक़दीर मिरी 
और सब जाग उठे खाट के सरकाने से  आगे पढ़ें

2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर