आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शकील आज़मी की ग़ज़ल: हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे

उर्दू अदब
                
                                                         
                            धुआँ धुआँ है फ़ज़ा रौशनी बहुत कम है
                                                                 
                            
सभी से प्यार करो ज़िंदगी बहुत कम है

मक़ाम जिस का फ़रिश्तों से भी ज़ियादा था
हमारी ज़ात में वो आदमी बहुत कम है

हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे
यहाँ तो फूल में भी ताज़गी बहुत कम है

जहाँ है प्यास वहाँ सब गिलास ख़ाली हैं
जहाँ नदी है वहाँ तिश्नगी बहुत कम है

ये मौसमों का नगर है यहाँ के लोगों में
हवस ज़ियादा है और आशिक़ी बहुत कम है

तुम आसमान पे जाना तो चाँद से कहना
जहाँ पे हम हैं वहाँ चाँदनी बहुत कम है

बरत रहा हूँ मैं लफ़्ज़ों को इख़्तिसार के साथ
ज़ियादा लिखना है और डाइरी बहुत कम है

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर