शाहजहां, अंदाज़, मुग़ल-ए-आज़म, बैजू बावरा, मदर इंडिया और गंगा जमुना जैसी फ़िल्मों में दिलकश संगीत देने वाले संगीतकार नौशाद बहुत सादा मिज़ाज इंसान थे। आम लोगों से मिलने-जुलने में भी वह कोई गुरेज़ नहीं करते थे। एक बार उनकी एक ऐसे नाबीना शख़्स (जो देख नहीं सकते) से मुलाक़ात हुई जो फ़िल्म देखने नहीं बल्कि सुनने के लिए जाता था।
पेंगुइन से प्रकाशित नौशाद की जीवनी ज़र्रा बना आफ़ताब में चौधरी ज़िया इमाम लिखते हैं कि नौशाद साहब की फ़िल्म 'दीदार' की नुमाइश मुंबई के मिनर्वा सिनेमा हॉल में लगी थी। एक दिन किसी काम से नौशाद साहब को वहां जाना पड़ा गया, वे सिनेमा के मैनेजर से मिले और अपने काम की बात करने के बाद जब चलने लगे तो उस समय शो चल रहा था तो मैनेजर ने उनसे कहा, "नौशाद साहब अगर वक़्त हो तो थोड़ी देर रुक जाइए मैं आपकी मुलाक़ात एक साहब से करवाना चाहता हूं।"
मैनेजर के इसरार पर नौशाद साहब रुक गए और शो ख़त्म होने से दो मिनट पहले दफ़्तर के बाहर आकर खड़े हो गए। फ़िल्म ख़त्म होने के बाद देखने वालों की भीड़ निकलने लगी तो नौशाद साहब ने देखा कि एक अधेड़ उम्र के नाबीना शख़्स अपने बच्चे के साथ हाथ थामे बाहर आ रहे हैं।
मैनेजर ने उनको अपने पास बुलाया और पूछा, "आपने यह फ़िल्म कितनी बार देखी है?" तो नाबीना शख़्स ने जवाब दिया, "छत्तीस बार देख चुका हूं।" मैनेजर ने उनसे पूछा, "आप देख ही नहीं सकते को फ़िल्म कैसे देख लेते हैं?" इस पर उन्होंने जवाब दिया, "मैं देख नहीं सकता मगर सुन तो सकता हूं। मैं यह फ़िल्म देखने नहीं सिर्फ़ सुनने आता हूं और पूरी फ़िल्म मुझे याद हो गई है।"
नाबीना शख़्स को लगता था कि 'दीदार' फ़िल्म में जैसे उसकी ही ज़िंदगी को पर्दे पर पेश किया गया है। ज़िया इमाम लिखते हैं कि मैनेजर उस नाबीना शख़्स को अपने दफ़्तर में ले आए साथ में नौशाद साहब भी थे। दफ़्तर में मैनेजर ने नाबीना शख़्स से फ़िल्म का एक गीत सुनाने को कहा तो उन्होंने 'बचपन के दिन भुला न देना' गाना इतना अच्छा सुनाया था कि अब नौशाद साहब से रहा नहीं गया और उन्होंने गाना ख़त्म होने के बाद ताली बजाई।
उस पर मैनेजर ने कहा, "बाबा आपको मालूम है ताली किसने बजाई।" उसके बाद मैनेजर से नौशाद साहब का नाम सुना तो वे उनके सीने से लिपट गए। उसके बाद वे साहब कभी-कभी नौशाद साहब के घर भी जाते और कहते, "आपके दर्शन तो नहीं कर सकता मगर आपकी आवाज़ से मुझे महसूस हो जाता है कि आप कैसे हैं?" वे साहब फ़िल्म की सिल्वर जुबली तक बिला नाग़ा रोज़ाना फ़िल्म देखने जाते रहे थे। एक बार उन्होंने नौशाद साहब को बताया था, "फ़िल्म का हीरो दिलीप कुमार भी नाबीना है, इसलिए इस फ़िल्म में मुझे अपनी कहानी नज़र आती है।"
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4 वर्ष पहले
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