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दस्तूर-ए-ज़िन्दगी

                
                                                         
                            बदलते वक़्त का हर राज़, समझाया नहीं करते,
                                                                 
                            
जो हाल-ए-दिल में हो, हर शख़्स को बताया नहीं करते।

सफ़र में ठोकरें मिलें, तो फिर शिकवा क्या करना,
सबक जो सीख लेते हैं, खता दोहराया नहीं करते।

हर एक चेहरा यहाँ मासूम सा लगता है मगर,
आईनों के शहर में सच को, छुपाया नहीं करते।

ख़ुशी में साथ चलने वाले तो मिल ही जाएंगे यहां,
ग़मों की भीड़ में लेकिन, कोई आया नहीं करते।

उसूलों पे जो आंच आए, तो टकराना ज़रूरी है,
झुका कर सर जहाँ में ‘देव’, नाम कमाया नहीं करते।
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एक दिन पहले

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