तुम भी रहो, मैं भी रहूँगा,
तुम कुछ ना कहना, मगर मैं सुनूँगा।
तुम्हारी झुकती नज़रों की हर बात चुराऊँगा,
तुम जो न कह सकी, वो मैं गुनगुनाऊँगा।
जब ज़ुल्फ़ें बिखरेंगी तुम्हारी नर्म हवाओं में,
मुझे पास ही पाओगी तुम, ले लेना बाहों में।
लफ़्ज़ क्या कहेंगे बस जज़्बात ही बहेंगे,
खामोशी गवाह होगी, हम एक दूजे के रहेंगे।
वादे टूट जाते हैं, जब वे जुबां पे आते हैं,
ख़ामोशियाँ रह जाती हैं, जब वे नजरों से आती हैं।
अनाम ये रिश्ता, इसे बिन नाम रहने दो,
इसे सागर में जाना है, इसे नदियों सा बहने दो I
-देवेन्द्र पंत
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