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"प्रेम का समर्पण"

                
                                                         
                            "प्रेम का समर्पण"
                                                                 
                            
रिश्तों की इस भागदौड़ में,
अक्सर शब्द कहीं खो जाते हैं,
पर जो अनकहे रह गए हों,
वही एहसास गहरे हो जाते हैं।
ज़रूरी नहीं कि हर दिन,
मैं गुलाब लेकर आऊं,
या चाँद-तारों वाली,
कोई झूठी कसमें खाऊं।
पर जब तुम थक कर चूर हो,
और मैं चाय का प्याला ले आऊं,
वही है मेरा प्रेम,
जो मैं शब्दों में कह न पाऊं।
तुम्हारी उलझनों को अपनी,
खामोशियों से सुलझाना,
तुम्हारी हर ज़रूरत को,
बिना कहे ही जान लेना।
दुनिया के लिए शायद,
ये महज़ एक ज़िम्मेदारी है,
पर मेरे लिए तो यही,
मेरे जीवन की सबसे बड़ी साझेदारी है।
अंतिम समय तक हाथ थामे,
बस यूँ ही साथ चलना है,
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान में ही,
मुझे अपनी खुशियों को ढूंढना है।
— धर्मेंद्र राय "कृष्णा"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
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