चालिस साल पहले
जैसे ही घरों में टीवी की एंट्री हुई
किताबें बाहर हो गई।
( खुद बाहर नहीं हुई, हमने बाहर कर दी)।
ठीक उसी समय
फाउन्टेन पैन का भी जनाजा निकला ।
बोल पैन हमारे पर सवार हो गई ।
फिर तो बोल पेन की भी अवहेलना शुरू हो गई,
मोबाइल के आगमन से ।
अब
लोग की-पेड पर व्यस्त, मस्त, मदमस्त है।
याद है ना
हमारे अभ्यास काल -कालेज के दिनों में
एक युवा कवि के रूप में मुझे
लायब्रेरी में स्याही से लबालब ऊंगलीया वाली लडकीयां परीयों से भी ज्यादा हसीन लगती थी।
दुनिया में ' ऐखलास और मुहब्बत की विचारधारा कायम हो ' ऐसा एक ड्राफ्ट हमने टाइप करवाया था।
जिस के नीचे
मेरे अंगूठे से बने सिक्के पर
अपनी लिक होती मगर बहुत प्यारी पैन से तुमने दस्तखत की थी ।
- दिलीप व्यास
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