गुफ़्तगू बंद न हो
बात से बात चले
सुब्ह तक शामे-मुलाक़ात चले
हम पे हंसती हुई ये तारों भरी रात चले
हों जो अल्फ़ाज़ के हाथों में संगे-दुश्नाम
तंज़ छलकाये तो छलकाया करे ज़हर के जाम
तीखी नज़रें हों तुर्श अबरुए-ख़मदार रहें
बन पड़े जैसे भी दिल सीनों में बेदार रहें
बेबसी हर्फ़ को जंजीर-ब-पा कर न सके
कोई क़ातिल हो मगर क़त्ले-नवा कर न सके
सुब्ह तक ढल के कोई हर्फ़े-वफ़ा आएगा
इश्क़ आएगा बसद लग़जिशे-पा आएगा
नज़रें झुक जाएंगी, दिल धड़केंगे, लब कापेंगे
ख़ामोशी बोस: ए लब बनके महक जाएगी
सिर्फ़ गुंचों के चटकने की सदा आएगी
और फिर हर्फ़ो-ओ-नवा की ज़रूरत होगी
चश्मो-अबरू के इशारों में मोहब्बत होगी
नफ़रत उठ जाएगी, मेहमान मुरव्वत होगी
हाथ में हाथ लिये सारा जहां साथ लिये
तोहफ़ा-ए-दर्द लिये प्यार की सौग़ात लिये
रहग़ुज़ारों से अदावत के गुज़र जाएंगे
खूं के दरयाओं से हम पार उतर जाएंगे
गुफ़्तगू बंद न हो
बात से बात चले
सुब्ह तक शामे-मुलाक़ात चले
हम पे हंसती हुई ये तारों भरी रात चले
अबरुए-ख़मदार- तिरछी भवें
जंजीर-ब-पा- पैर में जंजीर बांधना
लग़जिशे-पा- पैरों का कंपन
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