आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अली सरदार जाफ़री की मशहूर नज़्म: गुफ़्तगू बंद न हो

उर्दू अदब
                
                                                         
                            गुफ़्तगू बंद न हो 
                                                                 
                            
बात से बात चले 
सुब्ह तक शामे-मुलाक़ात चले 
हम पे हंसती हुई ये तारों भरी रात चले 

हों जो अल्फ़ाज़ के हाथों में संगे-दुश्नाम 
तंज़ छलकाये तो छलकाया करे ज़हर के जाम 
तीखी नज़रें हों तुर्श अबरुए-ख़मदार रहें 
बन पड़े जैसे भी दिल सीनों में बेदार रहें 
बेबसी हर्फ़ को जंजीर-ब-पा कर न सके 
कोई क़ातिल हो मगर क़त्ले-नवा कर न सके 

सुब्ह तक ढल के कोई हर्फ़े-वफ़ा आएगा
इश्क़ आएगा बसद लग़जिशे-पा आएगा  
नज़रें झुक जाएंगी, दिल धड़केंगे, लब कापेंगे 
ख़ामोशी बोस: ए लब बनके महक जाएगी 
सिर्फ़ गुंचों के चटकने की सदा आएगी

और फिर हर्फ़ो-ओ-नवा की ज़रूरत होगी 
चश्मो-अबरू के इशारों में मोहब्बत होगी 
नफ़रत उठ जाएगी, मेहमान मुरव्वत होगी 
हाथ में हाथ लिये सारा जहां साथ लिये 
तोहफ़ा-ए-दर्द लिये प्यार की सौग़ात लिये 
रहग़ुज़ारों से अदावत के गुज़र जाएंगे 
खूं के दरयाओं से हम पार उतर जाएंगे 

गुफ़्तगू बंद न हो 
बात से बात चले 
सुब्ह तक शामे-मुलाक़ात चले 
हम पे हंसती हुई ये तारों भरी रात चले 

अबरुए-ख़मदार- तिरछी भवें
जंजीर-ब-पा- पैर में जंजीर बांधना 
लग़जिशे-पा- पैरों का कंपन 


हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।


 
19 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर