मंजिलें होती यहां सबकी पर पाते नहीं
लोग कुछ मुकाम तक पहुँच पाते नहीं .
गर्दिशों में रह जाते हैं सितारे ताजिंदगी
रात दिन चलते हुए भी मंजिलें पाते नहीं.
रियासतों के बल पर जो शानो-शौकत से रहे
मुश्किलें जिंदगी में इस तरह की उठाते नहीं.
निवाला घर के अंदर ही मिल गया जिनको
अजगर,कभी शेर की तरह दौड़ लगाते नहीं.
जिन्दगी फिसल जाती है ये रेत की मानिन्द
हाथ मसले हुए लिए कुछ भी कर पाते नहीं.
-दिनेश चौहान
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