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मदिरा मरहम बन गई

                
                                                         
                            सुरा सुरों को प्रिय रही असुरों की थी जान
                                                                 
                            
हर युग में बहती रही बनकर सब की शान .

भारी जब भी मन हुआ लगी हृदय को चोट
मदिरा मरहम बन गई दूर हुई हर खोट .

चल मदिरालय तक गये टूट गये जो मन
झोली में खुशियाँ लिये भी पहुँचे कुछ तन .

ऊँच नीच का भाव तज जुटते सारे लोग
तन मन में समभाव ला लगते हैं फिर भोग.

सागर मन्थन से मिला रत्न सुरा भी एक
हेय दृष्टि क्यों फेंकते मिलकर लोग अनेक.

दर्द हदों से जब बढ़ा फूटा बन नासूर
पीने से राहत मिली फिर कैसा ये कसूर.
-दिनेश चौहान
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2 दिन पहले

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