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जागीरदार

                
                                                         
                            बचपन की जागीर का जागीरदार न समझ मुझे
                                                                 
                            
बड़ी ख्वाईशो की मालकियत के ढोंग में
दो चार किश्तों में जिंदगी गुजार रहा हूँ
रोज बचपन से झगड़कर, समझदारी तेरा रुतबा बढ़ा रहा हूँ।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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4 वर्ष पहले

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