बचपन की जागीर का जागीरदार न समझ मुझे
बड़ी ख्वाईशो की मालकियत के ढोंग में
दो चार किश्तों में जिंदगी गुजार रहा हूँ
रोज बचपन से झगड़कर, समझदारी तेरा रुतबा बढ़ा रहा हूँ।
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