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बोझ बन गए अब तुम हाक़िम ..

                
                                                         
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चीख-चीख कर कह रही हैं कुर्सी,बोझ बन गए अब तुम हाक़िम
देश हमारा हैं जान से बढ़कर,व्यापार नहीं है यह हाकिम

आज अगर तुम न समझे तो,देश तुम्हें धिक्कारेगा
जग करेगा रुसवा हर दिन,और कुर्सी से उतारेगा

फाइलों के नीचे दबे पड़े हैं,तुम्हारी कसमें तुम्हारे वादें
कुर्सी मिलते ही भटक गए तुम,कहाँ गए फ़ौलादी इरादें

सियासत के बाज़ार में,ईमान बिका - नीलाम हुआ
जो कल तक था देशभक्त,वो आज यहाँ बदनाम हुआ

वेरोज़गारी चरम पर हैं,शिक्षा का बुरा हाल हैं
भूख से मजदूर मर रहे हैं,किसान भी बेहाल हैं

जनगण का उपहास उड़ाकर,कब तक यूँ इतराओगे
झूठे वादे झूठे किस्से,और कब तक युहीं सुनाओगे

आज अगर तुम न समझे,यह देश तुम्हें धिक्कारेगा
जग करेगा रुसवा हर दिन,और कुर्सी से उतारेगा

धर्म-संप्रदाय की आड़ में,मणिपुर जलता छोड़ दिया
भरोसा किया था पूरे देश ने,भरोसा तुमनें तोड़ दिया

नोट-बंदी ने कमर तोड़ दी,काला धन भी नहीं आया
विदेशी क़र्ज़ बढ़ गया हैं,देश पर आर्थिक संकट छाया

सत्ता की इस अंधी धुन में,संविधान हमारा रोता हैं
जाग रहा हैं व्यापारी पर,देश हमारा सोता हैं

नदियों ने बहते आँसू देखे,खेत भी सूखे पड़े रहे
झूठे वादों के पहरे में,अपने ही घर में उजड़े रहे

विश्वास किया था सभी ने तुम पर तुमने तो विश्वासघात किया
न अच्छी किस्मत लिखी देश की,ना सीमा का विस्तार किया

आज अगर तुम न समझे,यह देश तुम्हें धिक्कारेगा,
जग करेगा रुसवा हर दिन और कुर्सी से उतारेगा

अब बंद करो अब और छलावा,तुम ख़ुद को मिट्टी को अर्पण कर दो
देश हित में लगाकर जीवन,अहंकार का विसर्जन कर दो

जो तख्त तुम्हारी सनक पर हैं,वो ढहने की कगार पर हैं
जनता की अदालत लगी चुकी हैं,हर न्याय तुम्हारी हार पर हैं

इतिहास के पन्नों में फिर से,बस एक ही सच लिखा जाएगा
जो देश बेचने निकलेगा,वो ज़लील होकर ही जाएगा

आज अगर तुम न समझे, यह देश तुम्हें धिक्कारेगा
जग करेगा रुसवा हर दिन,और कुर्सी से उतारेगा

चीख-चीख कर कह रही हैं कुर्सी,बोझ बन गए अब तुम हाक़िम
देश हमारा हैं जान से बढ़कर,व्यापार नहीं है यह हाकिम

- डॉ.महेश यादव ( अमन गाँधी )
भोपाल ( म.प्र )
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 मिनट पहले

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