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राजेंद्र नाथ 'रहबर':  बरसती आग से कुछ कम नहीं बरसात सावन की

उर्दू अदब
                
                                                         
                            बरसती आग से कुछ कम नहीं बरसात सावन की
                                                                 
                            
जला कर ख़ाक कर देती है दिल को रात सावन की

उठी हैं काली काली बदलियां क्या तुम न आओगे
गुज़र जायेगी क्या तन्हा भरी बरसात सावन की

हमारी रात यूँ कटती है सावन के महीने में
इधर बरसात अश्कों की, उधर बरसात सावन की

किसी की याद आई है लिये अश्कों की तुग़्यानी
मिली है झोलियाँ भर कर हमें सौग़ात सावन की

डगर सुन्सान, बिजली की कड़क, पुर-हौल तारीकी
मुसाफ़िर राह से ना-आश्ना, बरसात सावन की

तुम्हारे मुँतज़िर रहते हैं सावन के हसीं झूले
किया करती है तुम को याद ये बरसात सावन की
 
तही-दस्ती का आलम, जामे-मय, साक़ी न पैमाना
ये किस ने छेड़ दी ऐसे में 'रहबर` बात सावन की

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18 घंटे पहले

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