उड़े तो ठीक मगर वापसी का ध्यान रहे
जमीं पुकारता, उसका भी तो कुछ मान रहे
जिया तू हाशिये पे, जद्दोजहद भी खूब रही
दूर जमाने से, तेरा अपना भी जहान रहे
था जिद के दिखायेंगे, हम ही हम हैं जहाँ में
अच्छा है घर के बाहर बंदे तेरी दूकान रहे
तौला किया है खुद को दुनिया की नज़र से
अपनी अज़ीम हस्ती का कुछ तो गुमान रहे
हँसे के फूल हो मगन, जियें फ़कीर सा
ख़ुदा की राह में बंदे तेरा मुक़ाम रहे
© डॉ. रश्मि झा
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X