आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

(तिमिर में दीप जलते हैं)

                
                                                         
                            तिमिर में दीप जलते हैं
                                                                 
                            
इस उपवन में फूल खिलते हैं।

मिलेगी न शांति
होगी फिर क्रांति
मांगता है देश-
जब तक यह पावक शेष!

इस आपाधापी के
भ्रष्ट हाथों में संघर्ष पलते हैं,
तिमिर में दीप जलते हैं
इस उपवन में फूल खिलते हैं।

इन अधमों का तो क्या?
भारत ने वैश्वानर की ताप झेली है!
पर... क्यों भूलते हो?
क्यों झूलते हो?

यहां नारी की गोद में
राम कृष्ण पलते हैं
तिमिर में दीप जलते हैं
इस उपवन में फूल खिलते हैं।

कोई बने सुभाष- गांधी
देश में बहे एक आंधी!
उखड़ेंगे चमन के शूल
खिलेंगे उपवन में फूल

सीचो गर शोणित से
शूल भी गलते है
तिमिर में दीप जलते हैं
इस उपवन में फूल खिलते हैं।
-हरि मोहन जांगिड़
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर