मैंने देखा शहर में,
रेलगाड़ी दौड़ती है—
एक इंजन, कई डिब्बे,
खींचते हुए अपने संग,
अपनी पूरी शक्ति,
अपने बल को निचोड़कर।
जब मैंने करीब से देखा,
तो लगा—
यह रेल कम,
पिता ज्यादा लगते हैं।
पिता,
जो हम सबको पालते हैं—
माँ, दादा-दादी, भाई-बहन;
हम सब इस इंजन के डिब्बे हैं।
हर सुबह पिता निकलते हैं,
कंधे पर एक गमछा लिए,
कुछ उम्मीदें, कुछ सपने
और ढेर सारी जिम्मेदारियाँ साथ लिए;
और शाम को लौटते हैं—
दाल, चावल, सब्ज़ी
और थोड़े से खुदरा पैसे लेकर।
हमारे कपड़े, चप्पल,
हमारी पुस्तकें,
दादा-दादी की दवाइयाँ—
सब कुछ पिता ही लाते हैं।
अपने लिए
वे कभी कुछ नहीं लाते।
उनकी कमीज़ फट जाती है,
माँ उसे प्रेम के धागे से सी देती है।
सबकी जरूरतें पूरी करते हुए
पिता
अलादीन के जिन जैसे लगते हैं।
मगर अपनी जरूरतों को
टालते रहते हैं—
दिन पर दिन,
सप्ताह पर सप्ताह।
मैं भूल गया था—
हर शाम उनके साथ
लौटती है थकान,
लौटता है एक दर्द।
फिर भी पिता मुस्कुराते हैं—
सुबह की एक किरण बनकर।
-हितेश रंजन दे
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