जिनकी है अनुरक्ति दंगों व फसादों में ही, वो हैं छात्र भला बोलो कैसे कोई मान ले।
गाली मुख पे रही विराज देखो जिनके हैं, अश्लील व्यवहार भी हैं पहचान ले।
ये नहीं विरक्ति भाव वाले कोई संत जन, जिनका हृदय है सरल यह जान ले।
लातों के जो भूत कभी बातों से न मानते हैं, सरकार अपनी भृकुटि अब तान ले।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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