धार बहै रस की चहुँ ओर हिया सबके हरषाय रहे।
नीकि लगै सिगरी धरती तिनका तिनका मुसुकाय रहे।
वर्ष नवा नव राति चलै मन मोदु भरै उफनाय रहे।
रंगु चढ़ा तन पै मन पै जन प्रेमु भरे बतियाय रहे।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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