"मैं सबमें स्वयं को देखता हूँ"
मैं सबमें स्वयं को देखता हूँ,
मित्र में भी, विरोधी में भी।
एक ही चेतना की धारा बहे,
नाम चाहे जो भी हो सभी।
सृष्टि चले त्रिगुण के तार पर,
सुर, असुर और नर का सार।
विज्ञान कहे प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन,
अध्यात्म बोले ईश्वर, जीव, संसार।
यही तीन गुण मन में भी बसते,
देव, दानव, मानव बनकर।
जो पल जिसकी हवा चले,
रूप वही पल में उतर।
जब _सतोगुण_ दीप बनकर जगे,
करुणा बन हाथ बढ़ाता है।
भूखे को रोटी, गिरे को सहारा,
उस पल मनुष्य ही ईश्वर दिखाता है।
जब _रजोगुण_ आँधी बनकर आए,
महत्वाकांक्षा, क्रोध, ईर्ष्या घेरे।
उसी आवेश में चोट लगे,
वही पल में असुर का फेरा।
और _तमोगुण_ जब छा जाता है,
आँखों पर उदासीनता का पर्दा।
न भला करे, न बुरा सहे,
बस देखे तमाशा, फेर ले सरदा।
पर ये रूप नहीं हैं स्थाई,
ये तो प्रारब्ध का खेल निराला।
आज जो बोया, कल वही काटें,
कर्म ही लिखता भाग्य का हवाला।
इसलिए विरोध से डरता नहीं मैं,
वो शायद मेरी परीक्षा बनकर आए।
मेरे सोए सतोगुण को जगाने,
ईश्वर ने उसे माध्यम बनाया।
मैं प्रेम का बीज आज बोता जाऊँ,
सेवा, सत्य, क्षमा सींचता जाऊँ।
कल जब समय का चक्र घूमेगा,
वही वृक्ष बनकर मुझे छाया दे जाएगा।
सृष्टि त्रिगुण, मन त्रिगुण, जीवन त्रिगुण,
पर चुनाव का अधिकार है अपना।
बीज हाथ में, खेत हाथ में,
फसल कैसी होगी — ये कर्म है अपना।
न निंदा, न घृणा, न मोह का बंधन,
बस समभाव का उजला दर्पण।
क्योंकि मैं सबमें स्वयं को देखता हूँ,
और उसी एक में सबको अपनाता हूँ।
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