"साक्षी"
मैं साक्षी हूँ बचपन की किलकारियों का,
आँगन की धूल और माँ की लोरियों का।
मैं साक्षी हूँ पिता के अनुशासन का,
और उनके मौन में छिपे वरदान का।
मैं साक्षी हूँ माता-पिता के देह त्याग का,
उस शून्य का, उस अंतिम दीप के बुझ जाने का।
मैं साक्षी हूँ जीवनसंगिनी के परलोक गमन का,
उस रिक्त बिस्तर और अधूरी प्रार्थना का।
मैंने गरीबी की रोटी का स्वाद भी जाना,
और अमीरी के भरे थाल का मान भी पाया।
धूप में तपना भी देखा, छाया में सोना भी,
हर मौसम ने मुझे एक नया पाठ पढ़ाया।
लाभ में फूला नहीं, हानि में टूटा नहीं,
बीमार तन को साधा, स्वस्थ में इतराया नहीं।
सुख आया तो धन्यवाद किया, दुख आया तो सीखा,
क्योंकि जानता हूँ - मैं इन लहरों का सागर नहीं।
न मैं गरीब हूँ, न मैं अमीर,
न मैं रोगी हूँ, न मैं शरीर।
जो आता है जाता है, जो बनता है मिटता है,
मैं तो बस उसे देखता हूँ, मैं वही शाश्वत चित् हूँ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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