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Social Media Poetry: भले अनभिज्ञता जतला रहा हूँ

वायरल काव्य
                
                                                         
                            भले अनभिज्ञता जतला रहा हूँ 
                                                                 
                            
मगर सबकुछ समझता जा रहा हूँ 
तुझे हर बात समझाना कठिन है 
मैं अपने आप को समझा रहा हूँ 

तू चेहरे से झलक उठता है पूरा 
मैं इसपे डॉक्टरेट करवा रहा हूँ 
जहाँ तू सर झुकाने जा रहा है
वहाँ से सर उठाये आ रहा हूँ 

इसे तू ग्रन्थ कर ले, काम का है
तुझे दिल का कहा बतला रहा हूँ
तुझे ज्ञानी बनाने के लिये मैं 
ख़ुशी से मूर्ख बनता जा रहा हूँ 

तेरा चुपके से दरवाज़ा भिड़ाना 
मैं इतने भर से खुलता जा रहा हूँ 
मुझे अपमान पी जाना पड़ा है 
मैं अपना ग़म ख़ुशी से खा रहा हूँ! 

कभी तुझसे ही मिलना चाहना था
अभी तुझसे भी मैं कतरा रहा हूँ 
तू मेरे सामने आया, जभी से —
मुसलसल आज तक हकला रहा हूँ

साभार : डाॅ राहुल अवस्थी की फेसबुक वाल से 

21 घंटे पहले

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