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शिकवा ऐ जहाँ

                
                                                         
                            कितनी हसरत भरी निगाहों से मुझे देखता हो कोई
                                                                 
                            
जैसे गुरबत को शोहरत में देखता हो कोई

अपने सामा को उठाओ के अब कूच करे
इस शहर में जैसे अब ना रहता हो कोई

मैंने देखा है सभी को यू मुझ पर तरस खाते
जैस खुशियो में दावत उड़ाता हो कोई

ऐसे दिखाते है सब चाक गिरेबा बन कर
जैसे हर शख्स यहां पर फरिश्ता हो कोई

है मेरी तबीयत का ये मामला के अब
जैसे बिस्तर पे रात भर जागता हो कोई

इंसा ही समझता नहीं इंसा को नूर
जैसे हर शख्स में बसा शैता हो कोई
-नूर हसन 
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एक घंटा पहले

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