अब मोहब्बत से मोहब्बत हो अब ना हो
जैसे ये वहेशत है जन्नत हो अब ना हो
पहले से मालूम नहीं क्या अंजाम कुर्बत का
हर वस्ल पर जैसे हिजरत है रंगत अब ना हो
इस जहाँ में है सबको अमा पाने की हसरत
तुम्हें इन बेचारों से अब हैरत हो संगत अब ना हो
वो सिमट रही हो गी अब ग़ैर की बाहों में
मुझे जैसे इस रम्ज़ पे अदावत अब ना हो
अब लाख लगे ज़ख्म दिल पे बख्श दूँ जमशेद
मुझे किसी दर्दे भरे आदम नफ़रत अब ना हो
-नूर हसन
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