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धूम्रकेतु

                
                                                         
                            संविधान है तो क्या हुआ
                                                                 
                            
दिन-प्रतिदिन बढ़ते अत्याचारी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
वेद हैं तो क्या हुआ
अज्ञानी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
राम-कृष्ण की गाथायें हैं तो क्या हुआ
गाथाओं के उपहासक भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।

विक्रय हेतु उपलब्ध हैं
मंडी में मूर्तियाँ
निराकार की
होने के लिए व्याख्यायित
तुमसे, हमसे।
न्याय के मंदिर में
नहीं सुनाई देती पवित्र शंखध्वनि
सुनाई देती हैं व्याख्यायें
भिन्न-भिन्न
एक ही धारा की।
सच कभी 'झूठ' हो जाता है
तो झूठ भी हो जाता है 'सच'
झूठ नहीं हो पाता 'झूठ'
सच नहीं हो पाता 'सच'
मौन रहती हैं सूर्य रश्मियाँ
नतशिर
कंपित
देखकर सूर्य को
जाते हुए अस्ताचल।

चर्चित होते हैं
कुछ पात्र
अपनी मृत्यु के पश्चात
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ।
राम, कृष्ण, बुद्ध और ईसा
गांधी, भीमराव और पेरियार
जीवित होते तो देखते
वे क्या थे, क्या हो गये
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ
जिनका नहीं है कोई संबंध
उनके होने से।

स्थायी है तमस
आने-जाने का काम तो
प्रकाश का है
जिसे
अब चाहता ही कौन है!
बहुत शक्तिशाली हैं
मायावी धूम्रकेतु
कोई वाशिंगटन में
कोई तेहरान मे
और भारत में तो
बड़ी भीड़ है इनकी।
क्या सचमुच
तैयार हो रहा है समय
करवट के साथ
सत्यमेव जयते के लिए!
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एक दिन पहले

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