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गरीबी ओढ़ के माँ ने

                
                                                         
                            गरीबी ओढ़ के माँ ने कई मौसम बिताए हैं,
                                                                 
                            
मगर बच्चों की ख़ातिर ख़्वाब ऊँचे ही सजाए हैं।

निवाला एक था घर में, मगर हिस्से कई निकले,
माँ ने भूखे पेट रहकर सबके चूल्हे जलाए हैं।

कभी रोटी को तकते थे, कभी छत पर पड़े-पड़े,
हमारे गाँव के बच्चों ने यूँ ही चाँद पाए हैं।

कहा माँ ने, "वो चाँद देखो, रोटी-सा चमकता है",
तभी से चाँद में हमने कई टुकड़े बनाए हैं।

धुएँ से काली आँखों में भी उजियारा नहीं टूटा,
गरीबी ने बहुत घेरा, मगर सपने बचाए हैं।

सफ़र की धूप में जब भी थकन ने पाँव रोके हैं,
माँ की दुआ ने राह में दरिया नए बहाए हैं।

कभी फूटी हुई थाली, कभी बरसात की छत थी,
मगर उस घर ने दुनिया को कई हीरे दिखाए हैं।

अभी भी याद है माँ का वो आधा कौर रख देना,
जो उसने भूख छुपाकर हमारे नाम खाए हैं।

फ़क़त रोटी नहीं होती, माँ के हाथ की रोटी में,
मोहब्बत, त्याग, ममता के कई किस्से समाए हैं।

हमारे घर की खिड़की से जो चाँद उतरता था,
उसी ने तंग गलियों में बड़े सपने जगाए हैं।
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2 घंटे पहले

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