मुद्दतों से दिल ने चाहा नहीं कुछ भी,
अब अरमान दिल में रहा नहीं कुछ भी।
चाहतों का सिलसिला बुझ सा गया है,
मेरा दिल जल जल के धुंआ धुंआ हुआ है।
खुद मेरा दिल, रहा नहीं मेरे ही दिल में,
अकेला ही पाता हूं, खुद को भरी महफिल में।
मुस्कुराहटों का सिलसिला थम सा गया है,
आग कोई सीने में रह रह कर जल रहा है।
धुआं धुआं हर मंजर दिख रहा है,
अपना ही दिल लौ बनकर जल रहा है।
अपना कोई दूर दूर तक नजर नहीं आता,
मेरा भी दिल अब मुझे, गैर कर रहा है।
जीत जाता दुनिया से अगर जंग होती,
खुद के दिल से हारना पड़ रहा है।
मौसम जैसे-जैसे हवाओं का रुख बदल रहा है,
सुलगते एहसास को और हवा मिल रही हैं।
मेरे जलते एहसास की खबर किसी को नहीं,
यहां अपना कोई दूर-दूर तक दिख नहीं रहा है।
उल्फत के दीए शिद्दत से जलाए थे मैंने भी,
अब एहसासो का तेल कम पर रहा हैं।
मैं अब खुद को खुद में ढूंढ नहीं पाता हूं,
खुद को ही अपना नाम बताना पड़ रहा है।
खुद को खुद ही संभाल ले युग,
क्या,बेरहमों की दुनिया में मरहम ढूंढ रहा है।
-कुमार युग
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X