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शब–ए-ख़ुमार

                
                                                         
                            प्यार इंतज़ार है, ख़त्म नहीं होता है
                                                                 
                            
नशीली चाहतों में शब–ए-ख़ुमार होता है

वो आ रहे हैं, वो आएँगे — वहम क्या कम है
हवा की आहटों से दिल क़रार खोता है

कमाल-ए-इश्क़ तो देखो, वो आए ही नहीं
वही है शौक़, वही इंतज़ार होता है

कोई इशारा तसल्ली, न कोई वादा मगर
शाम ढलते ही तेरा इंतज़ार होता है

चले भी आओ मेरे जीते-जी ओ मेरे सनम
बंद साँसों में कोई लाचार होता है

बजाए सीने के आँखों में दिल धड़कता है
धड़कती आँखों में सपना हज़ार होता है

मैं पूरे जिस्म को आँख बना राह तकूँ
हर एक मोड़ पे तेरा ही दीदार⁶ होता है

एहद⁷ नहीं, पयाम नहीं, गुफ़्तुगू नहीं
हैरत भी तेरी ज़ुस्तज़ू को बेक़रार होता है

कहीं वो आ के मिटा न दें इंतिज़ार का लुत्फ़
कभी-कभी असरदार भी बेज़ार होता है

ये इंतिज़ार न ठहरा, “कुँवर” अदा ठहरी
तेरे इंकार में भी इक़रार होता है
 – कुँवर सर्वेन्द्र विक्रम सिंह
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