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अल्फ़ाज हैं मेरे

                
                                                         
                            अल्फ़ाज हैं मेरे इन्हें मैं कैसे छुपाऊं ,
                                                                 
                            
एक छोटी बहन है मेरी उसे कैसे समझाऊं ।
उसे पता नहीं लोगों का ये कैसे दिखाऊं,
वो भोली भाली है उसे कैसे बताऊं।
जिनको जानना है उसे वो जानकर वी अनजान है,
ओर अपनी बातों में खुद को ढूंढ ढूंढ कर परेशान हैं ।
ना समझ है वो अभी सबको अपने जैसा है महसूस करे ,
नादान है वो अभी उसकी नादानी ही ऐसा करने पर उसे मजबूर करे ।
गुम-सुम सी रहती हैं इसलिए हर किसी को अपनी बातें नहीं कहतीं ,
अपनी बातों को मनवाती है समझाती हैं ओर सच साबित कर चली जाती है।
छोटों सी बच्ची है ओर बातें बड़ी बड़ी कर जाती हैं,
पता नहीं कब क्या कर जाती हैं।
उसमें एक डर सा देखा है ,
सहमीं सी रहती है ओर भयभीत कर जाती है ।
मेरी हर छोटी बातें को सच कर दिखलाने का बोल के चली जाती हैं,
वो बहन है मेरी अपना सपना सच कर दिखना चाहती हैं ।
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8 मिनट पहले

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