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फर्श से अर्श तक

                
                                                         
                                   
                                                                 
                            
     फर्श से अर्श तक

मशहूर थे वो भी एक ज़माने में।
और मशरूफ हैं वो आज भी गलियारों में।।

               ये बात और है कि तब्दील हैं वो राख में।
               क्या रही होगी खता जो मिल गए ख़ाक में।।

गुज़ारिश है इतनी कि जीते जी रहो अदब में।
वक़्त नहीं लगता अर्श से फर्श पे आने में।।

               न होगा हासिल गुरूर अपना दिखाने में।
               है मौका लगा दो दम किस्मत आजमाने में।।

मत भूलना लगता नहीं वक्त सवेरा होने में।
नींद होगी गवानी यदि पाना है कुछ जीवन में।।

                मिल जाए अगर शोहरत जिंदगी में।
                टांग कर रखना अंहकार को खूंटी में।।
लेखक:-महेश
दिनांक 26/03/2026
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