इश्क की गहराइयों में डूबता इतराता रहा,
मैं तेरी चाहत के समंदर में ही समाता रहा।।
तेरी मुस्कान की किरण जब भी दिल पे पड़ी,
मेरे इस वीरान रगों में जैसे नूर-सा बहता रहा।।
रात के आँचल में जब ये तारे सिसकते दिखे,
मैं तेरी याद के दिये को चुपके जलाता रहा।।
जब तेरे लफ़्ज़ों की मिठास रूह तक उतर गई,
हर एक हर्फ़ को मैं,अपने दिल में सजाता रहा।।
कभी नज़रों ने कही, कभी खामोशी ने सुनी,
मैं हर अंदाज़ में सदा तुझको ही बुलाता रहा।।
वक़्त की तेज़ हवाओं ने बहुत कुछ छीना मगर,
तेरे एहसास का दामन मैं थामे हुए जाता रहा।।
इश्क मेरे लिए कभी भी इबादत से कम न रहा,
मैं तेरे नाम पे ही, हर दर्द भी गुनगुनाता रहा।।
अब तो ये आलम है कि दुनिया भी धुंधली लगे,
सदैव तेरे ख्वाबों के जहां में ही मैं बसता रहा।।
- एम के सिंह
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