एहसानों के बोझ तले दबती रही हर साँस मेरी,
अपनों की महफ़िल में भी लगती रही प्यास मेरी।।
जिसने उठाया था कभी गिरते हुए मेरे हाथों को,
आज वो ही गिनाने लगा हर छोटी सी आस मेरी।।
लब हँसे भी तो ये आँखों ने बयाँ कर दी सच्चाई,
छुप न सकी इस दुनियां से, ये टूटी हुई प्यास मेरी।।
आज रिश्तों के आईने में जब देखा तो ये जाना मैंने,
हर शख़्स ने कीमत पे ही खरीदी है मिठास मेरी।।
मैंने तो चाहा था बस दिल से निभाना हर रिश्ता,
पर बन गई हर मोड़ पे आज मजबूरी ही रास मेरी।।
अब तो ये ठाना है मैंने की एहसानों से आज़ाद रहूँ,
खुद से ही लिखूँगा मैं, अपनी हर एक इतिहास मेरी।।
एहसान अगर दिल से हो, तो य़ह फूल सा महकता है,
वरना तो एहसान बन जाता है ज़ंजीर-ए-अहसास मेरी।।
- एम के सिंह
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