कविताओं का शहर
मैं कल कविताओं के शहर गई थी।
गली-मोहल्ले, चौक-चौराहे
मॉल-दुकान झुग्गी-झोपड़ियांँ
सभी कविताएंँ इधर-उधर व्यस्त थीं।
चलती-फिरतीं, बैठती-सुस्तातीं,
भींगती-बचतीं
सारी की सारी अपने-आप में खोई थीं ।
छोटी,मध्यम,बड़ी-सभी पंक्तियांँ रुकती, थकती, दौड़ती, हंँसती अपने प्रवाह में बहती जा रही थीं ।
श्रृंगारित होतीं, शांत, सौम्य,
मधुरिमा, मनोरमा
करुणा में बहतीं, हास्य में खिलखिलातीं
ललकारतीं, मुस्कुरातीं, आमंत्रित, प्रेरित करतीं
देशभक्ति गान गातीं, दिलों के गीतों को गुनगुनातीं झूलों में पेंगे मारतीं, तितलियांँ पकड़तीं
सजी-धजी, उदास, मौन, मुखर, वाचाल सारी कविताऍं गतिमान थीं।
मैं टुकुर-टुकुर उन्हें निहार रही थी।
दुपट्टे लहरातीं, सैंडल खटखटातीं, जींस-कुर्ती में फबतीं
कविताएंँ खुशनुमा माहौल तैयार कर रही थींं ।
पूरा शहर कविताओं की खुशबू से सराबोर था।
कविताएंँ मस्त-बिंदास चल रही थीं कुछ-कुछ उदासी की शबब में भी थी अपने-आप में पर पूर्ण थीं ।
मैं कल रात कविताओं के शहर में गई थी ।।
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