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माॅं ! तुम अम्मा रानी हो

                
                                                         
                            मांँ जब से तुम चली गई, तेरी यादें आती हैं।
                                                                 
                            
पल-पल बीता समय, और अधिक गहराती हैं ।।

पच्चीस बरस भी बीत गए, अब सब लगता है सपना।
तेरे बिन रहते-रहते,माँ बना न कोई भी अपना ।।

जीवनधारा में बहते हुए समीप तुझे मैं पाती हूंँ।
जहांँ खड़ी थी तुम पहले, वहीं खड़ी हो जाती हूंँ।।

मौन,चुपचाप तुम रहती थी मगर मुखर मैं बन जाती हूॅं।
अंतर बस इतना सा है, सब कुछ झेल जाती हूॅं।।

तुझसे ज्यादा दुनिया देखी, यह तो कितनी बड़ी हुई।
घूँघट में रहते-रहते, तेरी दुनिया थी छुई- मुई।।

तेरे माथे पर था आंँचल औ' सजी थी सलज्ज मुस्कान ।
गरम-गरम थीं रोटियाँ, भरे परातों में थे पकवान ।।

धुऍं से भर जाता ऑंगन, तुम उसमें घुट जाती थी।
भक्-से जलती आग में खाना तुरत पकाती थी।।

दोनों गालों को दबा- दबा कर बिन्दी से मुझे सजाती थी।
गूंँथ- गूंँथ कर दो चोटियांँ, मुझे निरख मुस्काती थी।।

बढ़ते हुए मुझे देखकर खुद भी बढ़ती जाती थी।
छोटे-छोटे मेरे कर्मों पर तुम तो बलि- बलि जाती थी ।।

आया एक ऐसा झोंका बेबस तुम रह गई मांँ ।
एक ओर पत्नी थी तुम तो एक ओर केवल मांँ ।।

तेरी उस विवशता ने छवि अनछवि उकेर दिया।
सुंदर चित्र बन नहीं पाया, सर्वत्र रंग बिखेर दिया।।

तड़प- तड़प कर शांत हुई, देखा निज आंखों से मैंनें।
घर से बाहर कब तुम गई, विदा नहीं किया था मैंने ।।

स्वार्थहीन जीते-जीते स्वार्थियों से स्वतंत्र हुई।
पता नहीं फिर क्या हुआ, अर्थी में सज-धज तुम गई।।

कर्तव्य निभाया था मैंने, त्याग दिया बच्चे का मोह।
गर्भ में नन्हीं जान लिए, कोशिश किया कम हो बिछोह ।।

सबने अपने हित को साधे, बीच भंँवर में पड़ी रही ।
सारा बोझ लिये सिर पर मंँझदार में ही डूब गई ।।

रखा कदम जो बाहर तूने, लौटी थी फिर नहीं वापस।
अपना मान बनाये रखा, क्षीण हो गये सबके साहस ।।

स्तब्ध खड़े थे नर औ' नारी, नहीं दिया किसी को मौका।
बेटी से मिलकर चल दी, डूबे अब भंँवरों में नौका ।।

रोते थे सब लोग-लुगाई, रोये मुन्शी सह पटवारी ।
मालकिन का मुख न देखा, आज पड़ी धरती बेचारी ।।

कंधों पर चढ़ चली गई, जाने कौन-सा देश गई।
जिस सहचर की करती थी सेवा, निपट अकेला छोड़ गई।।

बूढ़े पिता की आंँखों से आंँसू झर-झर बहते थे।
घुटक-घुटक कर चौबीस घंटे आंँसू पीते रहते थे।।

गया था न कोई भूखा हे अन्नपूर्णा! कहांँ गई तू?
सबका ध्यान रखने वाली सबकी माता, कहांँ गई तू?

तेरे सतीत्व की आंँच में रोशन सारा जग हुआ।
सेवा-समर्पण-त्याग देखकर अखिल विश्व रोता रहा।।

घर की सारी हवाओं में मैंने तुझको खोजा है।
सद्य:स्नान के बाद तेरे हाथ में जल का लोटा है।।

तुलसी चौरे में जल अर्पित होठों पर खिलती मुस्कान।
दप-दप करते चेहरे पर लाल बिंदी से हो बिहान।।

चाहे जितना लीप -पोत ले, तेरा ही अक्स उभरता है।
तेरे सुकर्मो,दुआओं का चहुॅंओर झरना बहता है।।

मन में हरदम प्रश्न उठे क्या तेरे पास मैं आऊंँगी?
तेरी डाॅंटे सुन-सुन कर क्या तेरे गले लग पाऊंँगी ?

जीवन पथ में चलते-चलते थकती जाती हूंँ मैं मांँ।
तेरे सुकून की शीतल साया अब नहीं नसीब है मांँ ।।

युग बदले , स्थान बदले, लोग बदल जाते हैं ।
जो न कभी भी बदले वह केवल तू माते है।।

संसारिकक छलनाओं से माॅं तू सदा छली गई।
जिसको जैसे रहना रहे, तुम तो सबकुछ छोड़ गई ।।

दुनिया की नजरों में अब तू बस एक कहानी हो ।
लेकिन मेरे लिए हरदम माॅं तुम अम्मा रानी हो।।
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एक घंटा पहले

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