थोड़ा भी आभास हुआ होता ऐसे,
ये रोग जुदाई में तू रोता ऐसे ।
दर्दे दिल की दवा जो बने होते हमदम,
फ़िर गुलिस्तां न ख़ाक मिला होता ऐसे ।
ऐ इश्क जमाने को अब मगरुर मत कर,
जो आज दिलरुबा को क्यूं खोता ऐसे ।
ये राज छुपाना भी जो आता मुझको,
देख उसे बेहाल जरा होता ऐसे ।
ऐ इश्क खुदा की रहमत है जो तुझ पर,
जो महफिल आज सजाया होता ऐसे ।
जाने जिगर सितम अब सह न पाएंगे,
दर्द रत्न के आज मिटाया होता ऐसे ।
ऐ सनम खता हर वो आज भुला दूं तो,
खुद फ़रोगुजस्त बताया होता ऐसे ।
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