हाथों में मोबाइल हर समय रहता,
मन कहीं और भटकता रहता।
नजरें स्क्रीन में ही उलझी रहतीं,
अपनों से बातें कम ही होतीं।
खेल-कूद सब पीछे छूट गया,
बचपन जैसे कहीं टूट गया।
पर्व-त्योहार तक सीमित हो गया,
शादी स्टेटस तक सीमित हो गया।
सुखी भी ऑनलाइन हो गई,
दुखी भी ऑनलाइन हो गई।
हँसी भी अब ऑनलाइन हो गई,
खुशियाँ जैसे कम हो गईं।
आओ मिलकर ये ठान लें,
मोबाइल से थोड़ा दूरी मान लें।
जीवन को फिर से जीना है,
अपनों के संग हँसना है।
— ओम प्रकाश मौर्य
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