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आइना वही रहा

                
                                                         
                            आईना वही का वही रहा, पर सूरत बदल गई
                                                                 
                            
जवानी न जाने कब आंचल छुड़ा कर चली गई
आइने ने क्या क्या मंजर देखे
कभी बचपन की मासूमियत
कभी जवानी की मस्तियां
कभी बुढ़ापे की साजिशें देखीं

ये न बदला कभी, साल दर साल वही रहा
इंसान क्या से क्या हो गया
जो कल था वो आज नहीं,जो आज है वो कल नहीं
इस आज कल की कशमकश में
जिंदगी रेत की तरह हाथ से फिसल गई

कभी सुख की घड़ियां, कभी दुख के पल
कभी सकूं कि ठंडी छांव, कभी धूप की तल्खियां सही
आईना वही रहा, पर सूरत बदल गई
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एक दिन पहले

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