पत्ते जो गिर पड़े शाखों से, हवाएं क़ुसूरवार हो गईं..
बरस गई बूंदे बेसाख्ता, तो घटाएं क़ुसूरवार हो गईं..।
वो चारागर भी, कुछ समझ नहीं सका है दर्द उसका..
मर्ज़ ही ला- इलाज था, मगर दवाएं क़ुसूरवार हो गईं..।
हर तरफ़ से बरस रही है, बारूद–ओ–चिंगारी यहां..
एक ही थी, जाने कैसे सब दिशाएं क़ुसूरवार हो गईं..।
सोचता था कि ना हो उनको, दर्द-ओ-गम ज़िंदगी में..
आंसुओं का समंदर मिला, सदाएं क़ुसूरवार हो गईं..।
किस किस बात पर अफ़सोस करे आखिर "क्षितिज"
वक्त का सितम था, मेरी कविताएं क़ुसूरवार हो गईं..।
-पवन कुमार "क्षितिज"
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