आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क़ुसूरवार

                
                                                         
                            पत्ते जो गिर पड़े शाखों से, हवाएं क़ुसूरवार हो गईं..
                                                                 
                            
बरस गई बूंदे बेसाख्ता, तो घटाएं क़ुसूरवार हो गईं..।

वो चारागर भी, कुछ समझ नहीं सका है दर्द उसका..
मर्ज़ ही ला- इलाज था, मगर दवाएं क़ुसूरवार हो गईं..।

हर तरफ़ से बरस रही है, बारूद–ओ–चिंगारी यहां..
एक ही थी, जाने कैसे सब दिशाएं क़ुसूरवार हो गईं..।

सोचता था कि ना हो उनको, दर्द-ओ-गम ज़िंदगी में..
आंसुओं का समंदर मिला, सदाएं क़ुसूरवार हो गईं..।

किस किस बात पर अफ़सोस करे आखिर "क्षितिज"
वक्त का सितम था, मेरी कविताएं क़ुसूरवार हो गईं..।
-पवन कुमार "क्षितिज"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर