मेरी तन्हाइयों को, उनकी महफ़िल की दरकार नहीं..
बीते हुए वक्त से जियादा, दिल पर कोई भार नहीं..।
उम्र-भर ज़माने से, कभी खुदा से मांगते ही रहे हम..
मगर अब हम पर, दम·ए·लम्हों का कोई उधार नहीं..।
दिल के चमन में यादों के गुल, इस कदर मुरझा गए..
अब जहां में कोई,याद-ए-महबूब-ए-गुल-अज़ार नहीं..।
वो नगमा–ओ–तराने, किसी और जहाँ की बात हुई..
हम इन्तज़ार में हैं मगर, अब कहीं कोई साज़गार नहीं..।
अब तो इन फ़ज़ाओं के चेहरे बहुत बेनूर हो चले हैं..
आती तो है मगर पहले सरीखी आती वो बहार नहीं..।
-पवन कुमार "क्षितिज"
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