हां हूं मैं बेचैन तेरे चले जाने से,
हां हूं मैं परेशान तेरे ना आने से,
रोती तो मेरी क़िस्मत भी होगी,
ना जाने तू अब कहां कैसी होगी,
रुला कर जाना फितरत नहीं तुम्हारी,
खुद को संभाल लूं यह आदत नहीं हमारी,
सवाल तो कई थे पर जवाब नहीं,
बस इतना ही बता जाती,
जाना जरूरी था क्या?
बीते लम्हें साथ बहुत है,
किस्से जुदाई के याद बहुत है।
दर्द की वजह जानता हूं मैं,
आंखों से बहते मोतियों को पहचानता हूं मैं,
तुम्हारा चले जाना लाज़मी था यह मानता हूं मैं।
तुझे पाने की चाहत न थी मेरी,
तू अब आख़री राहत है मेरी।
कमबख्त हिम्मत ना थी मेरी न पूछा न पूछ पाऊंगा कभी, कम से कम इतना ही समझा जाती,
जाना जरूरी था क्या?
खयालों में खोए रहना आदत नहीं मेरी,
पता नहीं क्यों तू अब आख़री इबादत है मेरी।
चलना तो जिंदगी भर साथ था तेरे,
चले कुछ दूर ही सही हाथों में वह हाथ तेरे,
थे हम मजबूर ही सही......
ना तैयार था ना हूं मैं यह मानने को,
वो प्यार नहीं बस फितरत थी तेरी,
आखिर कोई तो पूछे उससे जब जाना ही था तो आई क्यों? काश कि तुम इतना बता पाती,
जाना जरूरी था क्या?
ना था तैयार ना होऊंगा कभी,
तू चली जाएगी मैं ना रोऊंगा कभी।
खड़ा रहा मैं एकटक उसके मासूम चेहरे को देखते हुए.... तरस गया मैं जानने को क्या है दिल में तेरे?
आंखों से ओझल हो गई जिंदगी मेरी बोझिल हो गई।
क्यों पकड़ा तुमने हाथ मेरा क्यों छोड़ गई तुम साथ मेरा, काश कि ऐसा हो पाता जिंदगी भर तेरे साथ हो पाता,
ना समझा मैं तू ही समझा जाती काश कि इतना बता पाती। जाना जरूरी था क्या?
जाना जरूरी था क्या?
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